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मन के राज़ mind specialist के साथ में स्वागत। बात चल रही है कि किस तरह से हम जिस भी उम्र के हैं, जिस भी स्थिति में है, या जो भी आसपास परेशानी चल रही है या किसी भी तरह से बहुत बड़ी कठिनाई पूरे समाज के सामने चल रही है, कैसे हम अपने आप को उन सब में बैलेंस करके, आने वाले समय के लिए भी, क्योंकि हो सकता है कि हमें इससे भी बड़ी परिस्थिति का सामना करना पड़े। तो किस तरीके से हम अपने आपको बैलेंस, मजबूत और लचकिला बनाए रखें। ये जो लचीलेपन का concept है जो कि आप पेड़ों में देखते हैं- जो पेड़ बिल्कुल सीधा है, लंबा है और बिलकुल नहीं हिलता, जब भी तूफान आता है वह पेड़ गिर जाता है। लेकिन जो पेड़ लचकीले होते हैं, वह किसी भी स्थिति का सामना कर सकते हैं। इसी तरीके से जो व्यक्ति यह art सीख गया कि जब भी कोई परिस्थिति आए, उसको आंकलन करने के बाद कैसे उसमें से बाहर निकलना है, सिर्फ यह सोचकर उसमें से बाहर निकले और फिर कैसे नई स्थिति में जो मैंने सीखा है, उससे आने वाली किसी भी स्थिति का सामना कर पाए। इसको resilience भी कहते हैं। और resilience जो है, वो आज के समय में scientifically ऐसा देखा जा रहा है कि कुछ ऐसे factors है जिनसे कि एक ही स्थिति में दो अलग-अलग व्यक्ति, एक उसका सामना अच्छी तरह से कर पाता है और दूसरा टूट जाता है, तो जो कर पाते हैं उनमें resilience, hope, empathy, altruism, gratitude..

ये कुछ ऐसी चीजें हैं जिनकी वजह से हम किसी भी स्थिति में अपने लिए भी फायदा महसूस कर सकते हैं और दूसरों के साथ भी रह कर, दूसरों के साथ भी मिलजुल कर इकट्ठे एक परिस्थिति का सामना कर सकते हैं। Hope - आज के समय में जब तक कोई भी परिस्थिति पूरी तरह से खत्म नहीं हो जाती there is always hope. So आशावाद में अगर हम ये पूछे कि कल शाम को बारिश होगी या नहीं या सूखा रहेगा, तो दो अलग-अलग व्यक्ति कोई भी जवाब दें, दोनों सही हैं, जब तक कि बारिश ना हो। तो उसी तरीके से आने वाला समय कैसा होगा उसमें अगर हमारे में आशा है तो जो सकारात्मक वादी है, पॉजिटिव हैं, वे कहेंगे- हां कोई दिक्कत आएगी तो उस समय deal कर लेंगे, कैसे deal करेंगे उस समय decide कर लेंगे। लेकिन आज के समय में आशावादी हूं कि कोई ना कोई तरीका निकल ही आएगा!

अगर हम आज के समय में frontline workers को देखें, खास तौर पर जो हॉस्पिटल्स में काम करने वाले कर्मचारी हैं, तो वहां पर जो लोग उनके पास आते हैं, उन लोगों से वो hope के द्वारा ही कैसे अपने शरीर की सारी की सारी fighting powers, जिनको की हम एक तरीके से रोग से लड़ने की क्षमता कहते हैं, वह कैसे बढ़ानी है उसमें उनकी मदद करते हैं। और वहां पर कोई व्यक्ति को लगता है कि हां मैं जिंदा रहूंगा, जो भी symptoms है मैं उससे बाहर निकल कर आऊंगा। मगर वहां पर उसके जो डॉक्टर हैं, nurses हैं, दूसरा स्टाफ हैं, और परिवार वाले, उस factor को अपने interactions में रखते हैं, तो आमतौर पर देखा गया है कि results positive रहते हैं।

और समाज के लिए हमें जरूरत है empathy, gratitude and altruism. Empathy मतलब दूसरे लोग किस चीज से गुजर रहे हैं इसके बारे में मुझे पूरा ज्ञान हो। और उसके लिए मैं जो कर सकता हूं वह मैं करूं। इसको इंग्लिश में कहते हैं- being in the other person's shoes and understanding where the shoe hurts. यानी कोई व्यक्ति अगर किसी तरह के कष्ट से गुजर रहा है, तो मुझे उसका वह कष्ट महसूस हो और महसूस करके मैं अपनी तरफ से जैसे अपने मन के द्वारों को खोल सकूं, उससे जो conditions हैं, और यहां पर खासतौर से कोविड-19 की जो बीमारी है और उसमें यह जिस तरह से फैलती है, जितनी ज्यादा लोग comfortable होंगे, जितने ज्यादा लोगों को यह बात समझ में आएगी कि वो किस तरह से अपने आप को और दूसरों को protect करें, तो ज्यादा से ज्यादा यह फैलने में ठीक नहीं होगा और हम रोक पाएंगे। लेकिन उसके लिए पूरे समाज के लोग अगर आगे बढ़के आएंगे, दूसरों की मदद करेंगे, जिसके पास नहीं है उसकी मदद करेंगे... अपने आप में होड़ या अपनी चीजों को संभाल के रखना, दूसरों की चीजों को भी लेना और वहां पर ये जो एक तरह से जो कई बार होड़ महसूस की जाती हैं, वहां पर दिक्कत आ जाती है। अगर वह ना रहे और दूसरों का ध्यान करके हम मदद करने की कोशिश करें और वहां पर हमारे एक basic emotion जिसको दया कह सकते हैं, altruism कह सकते हैं, actually दया से ज्यादा ये word है कृपालु, कृपालु होना। यानी वह व्यक्ति जो कि इस समय दूसरों की मदद कर सकता है, वह हाथ बढ़ाएं और जो अपने पास है वो भी दूसरों के साथ शेयर करें। और हमारे पास देने को हमेशा कुछ ना कुछ हो सकता है। और अगर physically भी कुछ नहीं है, तो दो मीठे शब्द- किसी का मन ना दुखाना, उसे hope देना, आशावादी बनाना, उसकी जो अच्छाइयां है, उनके बारे में बखान करना, और यह कहना ही कि हां मैं जो कर सकता हूं मैं आपके लिए ready हूं। ये देखा गया है कि ये एक बहुत बड़ा factor है, जिससे कि लोगों का मन भी stable हो जाता है और कोविड से लड़ने की जो उनकी क्षमता है वह भी बढ़ जाती है। क्योंकि उस समय में जो उनके मन के अंदर चलता है कि हां, मेरे साथ कोई है, किसी भी दिक्कत में, किसी भी परेशानी में कोई व्यक्ति मुझे मदद करने के लिए, गाइड करने के लिए तैयार है।

और इन सब के पीछे एक और emotion या एक और गुण जुड़ा हुआ है वह है- gratitude, शुकराना। जब हम शुकराना करते हैं, तो साथ ही साथ हमारे मन को लगता है कि मेरे पास सब कुछ है। क्योंकि आप तभी शुकराना कर सकते हैं, जब आप अपने अंदर भरपूर महसूस करतें हैं! So contentment और gratitude इकट्ठे चलते हैं। और contentment में आपको लगता है कि जो है, जितना है, काफी है। और अगर देखा जाए तो हम में से हर किसी के पास कहीं ना कहीं से कुछ ना कुछ आ जाएगा, चाहे वह गवर्नमेंट के प्रोग्राम्स हो, या NGOs के प्रोग्राम्स हो, या कोई फ्रेंड हो या जो आपकी savings हो, या अगर कुछ भी नहीं है तो कोई आप की हॉबी है जिसको की आप नए तरीके से लगा सकते हैं। तो ये जो ये फ्यूचर की सोच जिसमें कि लोगों को डर लगता है, अगर उसको शुकराने के द्वारा कि आज मेरे पास जो है चाहे पूरा शरीर है, या सिर्फ खाने पीने को है, या मेरे पास दोस्त है या मेरे पास परिवार है या मेरे पास skills है, कुछ ऐसी चीज हैं जिनसे कि मैं दूसरों की मदद कर सकता हूं, जब वह एक फीलिंग आती है, तो ना सिर्फ आपको भरपूर महसूस करने में मदद देती है लेकिन साथ ही साथ आपके पूरे शरीर के अंदर एक वो लहर ले आती है जिसमें कि शरीर को और मन को यह लगता है किसी चीज की कमी नहीं है। क्योंकि जहां कमी महसूस होती है वहीं पे लगता है कि इसको हुडने की या अपने अंदर समाने की, या जिसको कि कह सकते हैं कि बहुत ज्यादा greed होने की जरूरत है।

अगर हम देखे तो पूरा शरीर भी जो है उसके पास जो है, heart जो है वह blood को अपने पास नहीं रखता, पूरे शरीर में फेंक देता है। उसी तरीके से जब हम खाते हैं, तो जो पेट जो पचाता है तो वो जो पचा हुआ भोजन के रस हैं, वह पूरे शरीर में चलते हैं। Lungs द्वारा ऑक्सीजन ली जाती है बाहरी रूप से लेकिन फिर वह ऑक्सीजन शरीर के हर हिस्से में जाती है। तो इसी तरह से सकारात्मक मन भी अपने शरीर को हर हिस्से में दे पाता है... अगर वह सशक्त है, अगर वह भरपूर महसूस करता है.. और उसके लिए रोज शुकराना, सुबह उठकर, शाम को सोने से पहले। अगर हम यह याद रखें कि मेरे पास इन सब परेशानियों के बावजूद कुछ ना कुछ ऐसा है जिसकी वजह से जीवन चल सकता है, इस समय चल रहा है और उसके लिए अपना, परिवार का और समाज का, सबसे पहले खुदा का, भगवान का वो शुक्रिया अगर हम अदा कर सकें, तो उस शुक्रिया से ही हमारा जीवन चल सकता है।

और यह कुछ ऐसी चीजें हैं जो अगर जीवन का हिस्सा बन जाए तो किसी भी परिस्थिति में सबसे पहले क्या क्या है यह याद आएगा, क्या-क्या नहीं है ये नहीं। और उसके लिए कई बार बहुत अच्छा रहता है nature में जाना। क्योंकि अगर आप किसी पेड़ को देखें, हवा को देखें, वह अपनी smell, अपनी beauty या हवा, अपनी अक्सीजन मुफ्त में बांटती है, क्योंकि वो अपने आप में अपने आप को भरपूर महसूस करते हैं। तो अगर हम भी मनुष्य होने के नाते जब कोई crisis है, खास तौर पर कोविड-19 जैसा crisis, जिसमें हर व्यक्ति समाज का, जो-जो उसको करना है, यानी अपने और दूसरों को बचाना है, masking के द्वारा शरीर का भी और मन का भी, ना बुरा बोलो ना बुरा सोचो। उसी तरह से distance रखनी है नेगेटिव चीजों से, नेगेटिव emotions से, नेगेटिव लोगों से और नेगेटिव information से। और अपने आप को हर समय hygiene के द्वारा, sanitization के द्वारा यानी हर समय हम अपने मन को साफ रखें, संबंधों को साफ रखें। और अगर हम ये कर पाते हैं, तो कोई कारण नहीं है कि आने वाले समय में जो पूरे resources हैं हम सबके, समाज के, परिवारों के, मेरे अपने, वह इकट्ठा होके कोविड जैसी प्रॉब्लम से भी हम deal करके आगे बढ़ जाएंगे, क्योंकि इंग्लिश की एक कहावत है "this too shall pass, tough people last but tough situations don't!


 

 

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